इस बार कुछ कहना नहीं चाहती कि .."क्यूँ लिखी ये कविता"?? या कैसे ये विचार आया??🙃उम्मीद है कि आप सब समझ ही जायेंगे।। बस पहली बार कुछ प्रेम पर लिखने की कोशिश की है😌... हालाँकि ज़्यादा प्रेम के पक्ष में नहीं लिख पायी हूँ,, जो हमेशा मेरे लिए एक विडंबना रही है 🙂
कोई तो होता..जो छूता नहीं जिस्म को,, मेरी रूह को छू जाता,, उसका पहला बोसा.. माथे पर होता,, अकेले रोता हुआ ना छोड़ता,, सीने से लगाकर .. ख़ुद भी रो जाता,, ऐसा कोई तो होता।। मेरे होने पर कितनों को लगा.. ये होगी तो सब अच्छा होगा.. तुम्हारे होने से लगता है सब ठीक हो जायेगा,, जिसे मैं ये कह पाती .. ऐसा कोई तो होता।। कोई तो होता.. जिसका पहला स्पर्श कमर पर न होता,, हाथ थामकर.. वो थम जाता,, यूँ ही सारी रात गुज़र करता.. ऐसा कोई तो होता।। उसकी ज़रूरत जिस्मानी न होती.. वो रात भर यूँ बंद कमरे में .. सब्र बाँध कर बैठता,, उसकी मेरे लिए की गयी तारीफों में.. मेरे लबों का ज़िक्र न होता,, कहीं तो मेरी सीरत को बयाँ करता,, ऐसा कोई तो होता।। किसी का ज़ेहानी सुकून बनी मैं,, किसी का होना .. मुझे बेपरवाह कर जाता,, ऐसा कोई तो होता।। बाइक की पिछली सीट पर भले ही न बैठाता.. जब मैं सीढ़ियों पर चढ़ते- चढ़ते थक जाती.. पापा की तरह पीठ पर बैठाकर ले जाता,, 36-24...