"औरतों का दिमाग़ घुटनों में होता है" बहुत बार ऐसा सुनें जाने के आधार पर कुछ आंकलन .. मेरे द्वारा इस कविता के माध्यम से अभिवियक्त करने की कोशिश की गयी है।।
हाँ हम बेवकूफ हैं,,
हम घरेलू औरतें हैं ।।
हमे नहीं आता पैसों का हिसाब करना,
नहीं आता इंवेस्ट करना,,
हाथों में कभी ज़रूरत से ज़्यादा पैसे आये ही नहीं,,
कमाने का हक़ हमें दिया ही नहीं,
दिन की सब्जी का खर्चा मायके में,
बच्चों की पॉकेट मनी का खर्चा ..
ससुराल में जुड़ जाता है,,
हमने इन सब कामों की तंख्वाह कभी
मांगी ही नहीं,,
इसलिए हाँ हम बेवकूफ हैं,,
हम घरेलू औरतें हैं।।
हमें नहीं आता बैंक का फॉर्म भरना,
FD - RD का हिसाब रखना,
राशन के फिक्स डिपॉजिट (FD) की उलझनों में बंधे रहना,,
ज़रूरत के मुताबिक अनाज डब्बो में रखना,,
इतना ही जोड़ घटाना करने का दायरा सीमित रहा हमारा,,
इसलिए हाँ हम बेवकूफ हैं,,
हम घरेलू औरतें हैं।।
लोगों से डील करना हमें आता ही नहीं,,
Straight फॉरवर्ड ना बोलकर ,,
किसी को convince कर लेना,,
ये कैसे आता हमको??
Confrence मीटिंग की जगह ,,
बस एक परिवार ही शामिल था हमारी ज़िंदगी में,,
पूरा दिन..हर एक दिन इन्हीं को समर्पण हमारा,,
इसलिये हाँ हम बेवकूफ़ हैं ।।
कभी अकेले फ़िल्म देख आना,,
इतनी आज़ादी का मिलना..
जैसे ज़ीरो से किसी संख्या को भागा देना,,
और भागफल का शून्य आना ,,
इसलिए हाँ हम बेवकूफ़ हैं ।।
आज़ादी से बाज़ार की सड़को पर घूमना,,
अपनी पसंद को आंकना,,
हमें आया ही नहीं,, क्योंकि बाज़ार से ..
अकेले खरीददारी करने का अधिकार मिला ही नहीं,,
इसलिए कुछ भी ले आना,,
ऐसा कह देना मुनासिब लगने लगा,,
क्योंकि हम बेवकूफ़ थे,,
हाँ हम बेवकूफ़ हैं।।
यारों दोस्तों के साथ रेस्टोरेंट में बैठना ,,
ऐसा हमने अनुभव किया नहीं,,
काँटे- छुरी से खाना आता नहीं,,
चोप - स्टिक का भी पता नही,,
कोल्ड कॉफ़ी भी हुआ करती है क्या??
Ice -टी जैसा भी कुछ होता है,, ??
कंटिनेंटल फूड तो कभी सुना ही नहीं,,
ड्रिंक के नाम पर कोल्ड ड्रिंक जानते हैं,,
पहली बार मेन्यू में मोइतो (mojito) को मोजितो ही पढ़ा 😅
क्योंकि हम घरेलू औरतें है,,
हाँ हम बेवकूफ़ हैं।।
हाँ पुतिन और जैलेन्सकी की के औहदे का पता नहीं,,
खबरों की खबर हर सुबह लेना,,
बच्चों के टिफिन पैक करने से ज्यादा ज़रूरी लगा नहीं,,
फ़िर हमें सुनाया गया ,,
अनपढ़ हो तुम .. तुम्हें कोई ज्ञान नहीं,,
ये भी गलती हमारी.. क्योंकि
हाँ हम बेवकूफ़ हैं।।
हमें कहा गया तुम्हारा दायरा सीमित हैं,
सिखाया हमको सीमित रहना,,
रोटी बनाना, बर्तन धोना..
घर के सारे काम- काज करना,
सिखाया हमको अपनी सोच,
यहीं तक बाँधे रखना..
गलती हम किसकी आँके??
हम गलत..तो गलत हमें सिखाने वाले..
हम क्यूँ गलत..अगर सही हैं सिखाने वाले..??
फ़िर क्यूँ सुनें?? हम बेवकूफ़ हैं।
हमको अकेले बाहर जाने नहीं देना ..
मर्द हैं तो बाहर जाने के लिए..
हमको क्यूँ नहीं बताते घर जोड़ने का हिसाब??
फ्यूचर की प्लानिंग.. ये सब,
मर्द ही जाने तो बेहतर है,,
किसी ने हमें उभारना चाहा ही नहीं..
क्यूँ हमें अपने बराबर बैठा कर समझाया नहीं??
क्यूँ हमें दुनियादारी के कामों में झुल्साया नहीं..?
क्या वो तुम्हारा डर था??
हमारे बेहतर बन जाने का??
कहते हो.. औरतों का दिमाग़ घुटनों में होता है.,,
तुम्हारा दिमाग़ तो सही जगह पर था ना,,??
हमारे आने वाले कल का क्यूँ तुमने सोचा नहीं??
हमें तराशने वाले समझदार हैं तो...
हमारा समझदार ना होना कैसे सही??
अब कोई आंकलन करके बतलाए हमको...
किसका बेवकूफ़ होना सही..??
शानदार! बेहतरीन अभिव्यक्ति।
ReplyDeleteShukriya mohtarma
DeleteNice 👍🙂
ReplyDelete👌👌👌
ReplyDeleteअति उत्तम
ReplyDelete👍👍👍🙂🙂
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